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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

दो युवाओं के स्टार्टअप ने बदली किसानों की जिंदगी

- मप्र और अन्य राज्यों के एक हजार से ज्यादा किसान जुड़े
- जड़ी बूटियों की जैविक खेती, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन
- नीमच से शुरू कर आठ देशों में पहुंचाया कारोबार

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com
Key Word: Start up India, Startup Madhya Pradesh, Organic Farming, Youth Initiative, Farmers

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्टार्टअप इंडिया अभियान से पहले मप्र के दो युवाओं ने ऐसा कुछ कर दिखाया है जो बड़े-बड़े बिजनेस हाउस, उद्योगपतियों और पंूजीपतियों के लिए तो सबक है, साथ ही इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से दुनिया को अपने में समेटने का उदाहरण भी है। मध्यप्रदेश के नीमच जिले के दो युवाओं, शैलेंद्र धाकड़ और राजेश सागीतला ने जैविक खेती के माध्यम से किसानों के साथ मिलकर अपनी अब तक सात करोड़ का सलाना टर्न ओवर करने वाली कंपनी बना डाली है। इसमें यह खुद केवल मुनाफा नहीं कमाते हैं, बल्कि किसानों को भी संपन्न बना दिया।

शैलेन्द्र और राजेश ने वर्ष 2012 में जैविक और नेचुरल हर्बल इंडस्ट्रीज के क्षेत्र में काम को शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने कॉर्मल आॅर्गेनिक नाम से एक कंपनी बनाई। इन दोनों दोस्तों ने सबसे पहले नीमच और आसपास के किसानों को जोड़ा और इनके समूह बनाए। इन्हें स्मार्ट खेती के लिए प्रेरित किया। इन दोनों अपने अपनी आईडिया और स्टडी के आधार पर इन किसानों को जैविक तरीके से औषधीय पौधों की खेती के लिए तैयार किया। इसके लिए उच्च गुणवत्ता के बीज तैयार किए गए है, पौधरोपण के तरीके सिखाए और इनके रखरखाव में किसानों के साथ खुद भी मेहनत की। इसका नतीजा यह हुआ कि अनेक तुलसी, हल्दी, साइप्रस, हरड़, मुलैठी, अश्वगंधा, गुलमर, लैमनग्रास, सनाय और नीम जैसे अनेक औषधीय फसलें तैयार कीं। इसके लिए पहले उन्होंने नीमच जिले के किसानों को साथ लिया, फिर मप्र के कुछ दूसरे जिलों में उन्हें किसानों को जोड़ने में सफलता मिली। इस सफलता के बाद उन्होंने दूसरे राज्यों के किसानों के बीच भी यही प्रयोग किए। इससे किसानों की आय में काफी इजाफा हुआ और उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी। खास बात यह है कि इस काम की शुरूआत में उन्होंने किसी तरह की सरकार मदद ली। 
ऐसे चला बिजनेस
इन औषधीय पौधों की खेती भर करना इनका मकसद नहीं था। इन दोनों ने नीमच में ही इनकी प्रोसेसिंग का काम शुरू किया और फिर इसकी मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए जुट गए। आज स्थिति यह है कि इन दोनों अनेक उत्पाद तैयार कर लिए हैं जो ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुके हैं। 
आठ देशों में सप्लाई
कार्मल आॅर्गेनिक के उत्पाद आज भारत के साथ-साथ आठ देशों में सप्लाई हो रहे हैं। जैविक और हर्बल नेचुरोपैथी के यह उत्पाद ज्यादा फार्मा कंपनियां इस्तेमाल कर रही हैं। 
छह करोड़ का सलाना टर्न ओवर
इन दोनों युवाओं की इस कंपनी में इस वक्त 20 लोगों की टीम काम कर रही है। एक हजार से ज्यादा किसान इनसे जुड़े हैं और कंपनी का सलाना टर्न ओवर छह से अधिक का है। 

‘कान्हा’ बनेगा कैदियों की पहचान

 - बड़े ब्रांड को टक्कर देने की तैयारी में मध्य प्रदेश की जेलों में बंद कैदी
- हॉर्टीकल्चर, फ्लोरीकल्चर और डेयरी उत्पाद भी होंगे जेलों में तैयार

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com
Key word : Prison, Madhya Pradesh Jail Department, Prison break producer, Kanha 

भोपाल। प्रदेश की जेलों में बनने वाली सामग्रियां अब केवल जेलों में ही इस्तेमाल नहीं होंगी। अब इन्हें बाजार में उतारने की तैयारी की जा रही है। कैदियों द्वारा निर्मित यह सामग्री बाजार में ‘कान्हा’ के ब्रांड नेम से बिकेगी। जेलों में अब तक परंपरागत रूप से जो सामान बनता है, अब इससे आगे जाकर कई नए-नए उत्पाद भी अब कैदी तैयार करेंगे। 

प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों के स्किल डवपलमेंट और जेल में बनने वाली सामग्रियों के वृहद रूप में विक्रय के लिए जेल विभाग ने कवायद पूरी कर ली है। जेल विभाग की योजना को राज्य योजना आयोग ने भी मंजूरी देते हुए बजट राशि में इजाफा किया है। जेलों में नई मशीनरी लगाने की योजना है। फिलहाल जेलों में 10 से 15 प्रतिशत ही उत्पादन होता है। नई प्लान के मुताबिक एक साल में इसे बढ़ाकर 60 प्रतिशत ले जाया जाएगा। जेल में बनने वाले यह उत्पाद न केवल खुले बाजार में बेचने की योजना है बल्कि सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों भी इन उत्पादों को खरीद सकेंगे। 
विभाग बिना टेंडर कर सकेंगे खरीदी
लघु उद्योग निगम और सहकारी संघ जैसी सरकारी उपक्रमों के साथ ही अब सरकारी विभाग जेलों से भी सामग्री खरीद सकेंगे। यानी अब जेल विभाग भी प्रदेश में परचेसिंग एजेंसी होगा। इसके लिए राज्य सरकार ने भण्डार क्रय नियमों में संशोधन किए हैं। खासबात यह है कि जेलों में कैदियों द्वारा बनाई जाने वाली सामग्री जेल विभाग द्वारा निर्धारित दरों पर खरीदी जा सकेगी। सरकारी विभागों को इसके लिए टेंडर बुलाने की जरूरत नहीं होगी। 
क्वालिटी और ब्रांड वेल्यू
जेल विभाग के अधिकारियों ने कहना है कि कान्हा ब्रांड के लिए पांच साल की कार्ययोजना तैयार की गई है। इन पांच सालों में कान्हा ब्रांड को स्थापित करने और क्वालिटी पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। फिलहाल मप्र में ही कान्हा ब्रांड की वस्तुओं को योजना है लेकिन इसे प्रदेश के बाहर भी ले जाया जाएगा। 
जेलों में अभी यह काम होते हैं...
कंबल, दरी, चादर, बंदी वस्त्र, कारपेट, फर्नीचर, हस्तकला वस्तुएं, जैविक खाद, स्लीपर, फिनायल, साबुन, वाशिंग पावडर अगरबत्ती। इसके अलावा कई जेलों में आफसेट प्रिंटिंग और पेटिंग्स के काम भी किए जाते हैं। 
यह सामान भी बनाएंगे कैदी...
कृषि क्षेत्र से संबंधित वस्तुओं के उत्पादन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही फ्लोचीकल्चर और हॉर्टीकल्चर से संबंधित उत्पादन भी तैयार किए जाएंगे। जेल विभाग के पास 10 गौशालाएं हैं लिहाजा डेयरी प्रोडक्ट के क्षेत्र में भी कैदियों को उतारा जाएगा। 
लेबर भी उपलब्ध कराएगा 
प्रदेश की जेलों में बड़ी संख्या में बंद कैदियों के स्किल डवलपमेंट के लिए जेल विभाग श्रम आधारित सेवाएं भी शुरू करना चाहता है। यरवदा जेल में हुए प्रयोग के बाद प्रदेश की जेलों में इस प्रयोग को करने की कवायद है। इसमें जेल विभाग लेबर उपलब्ध कराएगा। यदि कोई कंपनी या संस्था कैदियों से कोई काम कराना चाहती है तो उन्हें वह काम सिखाकर तथा निर्धारित मजदूरी का भुगतान करने, पर उसे यह सेवा उपलब्ध कराई जाएगी। 
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हमारा फोकस बंदियों के स्किल डवपलमेंट है ताकि जब वे जेल से छूटे तो उनके हाथ में कोई न कोई हुनर हो। लेबर इंटेनसिव काम पर भी हमारा ध्यान है। जेलों में निर्मित उत्पादों को ‘कान्हा ’ ब्रांड नेम दिया गया है। अभी जो उत्पादन तैयार हो रहे हैं, उनके अलावा कई नाम उत्पाद तैयार करने की योजना है।
सुशोभन बनर्जी, एडीजी, जेल

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

गरीब महिलाओं के हाथों में आई ‘पंचायत सत्ता’ की कमान

गणतंत्र की ताकत : पंच-सरपंच, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य चुनीं गर्इं साढ़े पांच हजार महिलाएं

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

Key words : Madhya Pradesh, Women Empowerment, Rural Women, Panchayati Raj 

विविधताओं से भरे भारत देश की एकता और अखंडता इसकी पहचान रही है। देश में अनेक रूपों में दिखाई देने वाली इस अखंडता, एकता और समूह शक्ति ने लोकतंत्र के विकास को नए आयाम दिए हैं। मप्र के छोटे-छोटे गांवों, कस्बों, इलाकों और अंचलों में इस समूह शक्ति के दम पर आधी आबादी यानी महिलाओं ने ‘पंचायतों की सत्ता’ अपने हाथ में ले ली है। इन गरीब और इनमें कुछ अति गरीब महिलाओं ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है कि धनबल और बाहुबल के आधार पर ही चुनाव जीते जाते हैं। इन महिलाओं ने गणतंत्र और समूह शक्ति को चरितार्थ करते हुए एक दो नहीं पंचायतों के 5 हजार 412 पदों पर कब्जा किया। 

मप्र में पिछले साल हुए पंचायतों के चुनाव में जिला पंचायत सदस्य, जनपद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य तथा पंच-सरपंच के साढ़े पांच हजार पदों पर राज्य आजीविका मिशन के स्व-सहायता समूहों की महिलाएं चुनीं गर्इं हैं। इनके चुने जाने की मुख्य वजह यह रही है कि समूहों की सदस्यों ने प्रत्याशी चुनें, प्रचार किया और पूरे-जोर शोर से अपने समूह की महिला उम्मीदवार को जिताने में जुट गए। नतीजा यह हुआ कि राजनीति करने वाले अनेक धुरंधर इनके आगे नतमस्तक हो गए। इन महिलाओं ने समूह से जुड़कर पहले अपनी आजीविका के साधन तैयार किए। जब परिवार का भरण-पोषण करने की स्थिति में आ गर्इं तो फिर ग्रामीण विकास के लिए पहला कदम अपने गांव और अपनी पंचायत से ही उठाया। यह सभी गरीब महिलाएं पंचायत के विभिन्न पदों पर चुनकर बेहतर प्रशासन चला रही हैं। 
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पंचायतों की सत्ता में समूह से जुड़ीं गरीब महिलाएं

निर्वाचित पद का नाम संख्या
जिला पंचायत सदस्य 8
जनपद पंचायत अध्यक्ष 4
जनपद पंचायत उपाध्यक्ष         2
जनपद पंचायत सदस्य 136
ग्राम पंचायत सरपंच         667
ग्राम पंचायत उप सरपंच 40
ग्राम पंचायत पंच        4555
कुल                 5412

यह हमारे लिए गौरव की बात है कि मिशन से जुड़ीं महिलाएं न केवल अपने आर्थिक विकास के लिए परिश्रम कर रही हैं बल्कि उनमें इतनी जागरूकता आई है कि वे अब अपने गांव और प्रदेश के विकास के लिए भी सोचने लगी हैं। इतनी बड़ी संख्या में इन गरीब महिलाओं को चुना जाना, निश्चित तौर पर लोकतंत्र को मजबूती देता है।
- एलएम बेलबाल, सीईओ, एमपीएसआरएलएम

राष्ट्रीय बालिका दिवस : इन बच्चियों के हौंसले को सलाम...

- बाल विवाह के विरूद्ध बुलंद की आवाज 

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

प्रदेश में बाल विवाह की कुरीति के खिलाफ अब खुद लड़कियां आगे आ रही हैं। प्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा ऐसी जांबाज लड़कियां हैं जिन्होंने उम्मीद मिसाल कायम की है। बाल विवाह की शिकार इन लड़कियों ने अपने परिवार के फैसलों के विपरीत जाते हुए न केवल ससुराल जाने से मना किया बल्कि विवाह को ही शून्य कराया। यानी बचपन में हुइ शादी को अमान्य कर दिया। इन बच्चियों से कई लड़कियां अभी पढ़ाई-लिखाई कर रही हैं तो कुछ प्रशिक्षण लेकर अपने पैरों पर खड़े होने के प्रयास में जुटी हैं। प्रदेश में महिला खासकर लड़कियों के विकास लिए चल रहीं अनेक योजनाओं ने इस जागरूकता में अहम भूमिका निभाई है। बाल विवाह की कुरीति के खिलाफ आई जागरूकता का श्रेय प्रदेश के लाडो अभियान को दिया जाता है। योजनाबद्ध रूप से बालिकाओं की जारूकता के लिए चलाए गए इस अभियान में बड़ी संख्या में समुदाय की भागीदारी भी हो रही है। 

इन्होंने दिखाई हिम्मत

ससुराल जाने से ना किया तो घर से निकाला 
मंदसौर जनकूपुरा निवासी किशोरी का विवाह परिजन ने 4 साल पहले निंबाहेड़ा (राज.) के महेंद्र बंजारा से कराया था। कुछ दिन पहले माता-पिता व भाई ससुराल जाने का दबाव बनाने लगे। विरोध किया तो उसे घर से ही निकाल दिया। फिलहाल किशोरी आश्रयगृह में रह कर 11वीं की पढ़ाई कर रही है। उसका आवेदन महिला सशक्तिकरण कार्यालय के पास पहुंचा है।
16 वर्ष की उम्र है और दो बार हो चुका विवाह 
टाकेड़ा की 16 वर्षीय किशोरी का विवाह एक साल पहले जोटावद महिदपुर रोड निवासी जीतू पिता शांतिलाल से हुआ था। आठवीं में पढ़ने वाली किशोरी के पिता ट्रक ड्राइवर हैं। पता चला किशोरी का दो बार विवाह हो चुका है।
माता पिता को समझा कर विवाह शून्य कराने पहुंची 
मंदसौर के ही गलियाखेड़ी की 17 वर्षीय एक लड़की का विवाह दो वर्ष पहले झावल निवासी महेश बैरागी से करा दिया था। यह किशोरी फिलहाल पढ़ रही है।
मां-मामा ने की शादी, ‘लाडो’ से मिली प्रेरणा 
निंबोद की 11वीं की छात्रा का विवाह मां व मामा ने दो वर्ष पहले मिरावता तहसील अरनौद के प्रेम मीणा से कर दिया। मार्कशीट के अनुसार वतर्मान में छात्रा की उम्र 16 साल है। स्कूल में लाडो अभियान से प्रेरित हो विभाग के कार्यालय पहुंचकर विवाह शून्य घोषित कराने का आवेदन दिया।
श्यामू को सलाम
कु. श्यामू बाई बैस आज बी.ए. फाइनल की छात्रा है। वह अगर साहस नहीं दिखाती तो बाल-विवाह की बुराई से अभिशप्त होकर अपना जीवन बर्बाद कर लेती। उसने वर्ष 2005 में हुए अपने बाल-विवाह का विरोध किया और ससुराल जाने से इंकार कर दिया। उसकी इस हिम्मत के सामने मां-बाप भी नतमस्तक हुए। श्यामूबाई ने सिर्फ ससुराल जाने से ही इंकार नहीं किया बल्कि अपने विवाह को न्यायालय के जरिए शून्य भी घोषित कराया। उसके इस कार्य में शौर्या दल ने सहायता की। श्यामूबाई को सामाजिक कुरूतियों के विरूद्ध लड़ी गई लड़ाई के लिए रानी अवंती बाई वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इन्होंने सूचना देकर रुकवाया अपना विवाह
इंदौर कु. दिव्या राठौर और कु. मुस्कान भार्गव ने स्वयं आवेदन देकर अपना बाल विवाह रूकवाया। इसी तरह का साहस मंदसौर की भुवनेश्वरी रेकवार, सीहोर जिले की कु. मंजु वंशकार, अनूपपुर की पिंकी शुक्ला, काजल, मांगी पाटीदार, ज्योति, अनीता, ममता, रानू भावसार अहिरवार और देवास की आरती जाट ने दिखाया और अपना बाल विवाह रूकवाने के साथ ही शून्य घोषित करवाया। मंदसौर की ज्योति और देवास जिले के सिंगवादा की भारती जाट का विवाह तो 50 वर्ष की आयु के व्यक्ति से करवाया जा रहा था। इन दोनों ने भी महिला एवं बाल विकास को सूचना देकर अपना विवाह रुकवाया।
लाड़ो अभियान ने रोके कई बाल-विवाह
प्रदेश में सरकार ने लाड़ो अभियान के जरिये बाल-विवाह पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिये सभी जिले के लिये कार्य-योजना बनाकर कार्य किया। सभी ग्राम में कोर-ग्रुप का गठन कर उन्हें बाल-विवाह रोकने की जवाबदारी दी गयी। बाल विवाह को रोकने में शिक्षण संस्था, धार्मिक, ग्राम-पंचायत के सरपंच, वार्ड पार्षद और गाँव की नाईन को भी सदस्य बनाया गया है। पूरे प्रदेश में 4 लाख 7 हजार लोग कोर-ग्रुप के सदस्य हैं। अभियान में अभी तक 22 हजार 288 जागरूकता कार्यक्रम किये जा चुके हैं। इससे 51 हजार 835 बाल-विवाह पर रोक लगी। कई बालिकाओं के विवाह शून्य घोषित किये गये। अभियान के जरिये एक लाख 11 हजार 430 बच्चों को स्कूल में दाखिला भी दिलवाया गया।

जेंडर बजट : महिलाओं के नाम पर नहीं चलेगी खाना पूर्ति

- विभागों को वार्षिक प्रतिवेदन में देनी होगी विस्तृत और स्पष्ट जानकारी

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

मप्र में महिलाओं के सशक्तिकरण और कल्याण के लिए जेंडर बजट की व्यवस्था लागू होने के बाद अब इसे मजबूत किया जा रहा है। जेंडर बजट के नाम पर विभाग हर साल क्या करते हैं, अपने वार्षिक प्रतिवेदन में इसकी जानकारी देने नाम पर अब तक खानापूर्ति होती रही है। यही वजह है कि इस व्यवस्था के लागू होने के बाद सभी विभागों के स्तर पर कोई बड़ी पहल या कार्यवाही नहीं हुई, जिससे यह व्यवस्था सार्थक हो पाती है। 

इस स्थिति के राज्य सरकार ने जेंडर बजट व्यवस्था को मजबूत करने के लिए हाल ही में कुछ कदम उठाए हैं। अब सभी विभागों को इस व्यवस्था के तहत किए गए कार्यों की विस्तृत और स्पष्ट जानकारी हर साल विधानसभा को देनी होगी। विधानसभा के बजट सत्र में विभागों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले अपने वार्षिक प्रतिवेदनों में जेंडर बजट का अलग से विस्तृत चैप्टर होगा। इस चैप्टर में क्या-क्या जानकारियां देनी हैं, इसकी जानकारी सभी विभागों को भेज दी गई है। उन बिंदुओं और जानकारियों को अलग-अलग वर्गीकृत किया गया है, जिनकी जानकारी देना अनिवार्य होगी। 

ऐसा होगा जेंडर चैप्टर
- खंड एक : जेंडर मुद्दे, जेंडर गेप, प्रमुख मानकों की स्थिति
इस खंड में विभागीय योजनाओं और विभागों से संबंधित जेंडर मुद्दे होंगे। कम से कम तीन जेंडर मुद्दों पर जानकारी देनी होगी। खासकर वे जिन पर तत्काल काम करने की जरूरत है। 
उदाहरण : स्कूल शिक्षा विभाग इस खंड में जानकारी
देगा कि बालक-बालिकाओं की शैक्षणिक स्थिति, नामांकन, समय पूर्व शाला छोड़ने की स्थिति, साक्षरता दर एवं इसी प्रकार की अन्य जानकारी। इसके अलावा कृषि, नगरीय विकास, आधारभूत संरचना आदि क्षेत्र जहां स्त्री और पुरूषों के अलग-अलग आंकड़े जाना कठिन होता है, वहां प्रमुख मानकों के संदर्भ में जेंडर गेप्स पर टिप्पणी देनी होगी।
- खंड दो : जेंडर मुद्दों पर विभाग की पहल
यह खंड विभागों की उन नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों पर केंद्रित होगा जो जेंडर मुद्दों आर जेंडर गेप्स की पूर्ति के लिए हैं। 
उदाहरण : केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने जेंडर मुद्दों को राष्ट्रीय कृषि नीति 2000 में प्रमुख देने की पहल की है। किसानों पर राष्ट्रीय नीति 2007 में मानवीय और जेंडर पक्ष को सभी कृषि नीतियों और कार्यक्रमों में एक प्रमुख नीतिगत लक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है। 
खंड तीन : प्रमुख उपलब्धियां और चुनौतियां
इस खंड में योजनाओं और नीतियों, उनकी उपलब्धियों और चुनौतियों पर विभाग की जानकारी होगी। 
- खंड चार : केस स्टडी और गुड प्रेक्टिस
इस खंड में उन उदाहरणों को शामिल किया जाएगा जो विभाग के जेंडर विषयक लक्ष्यों की पूर्ति में मार्गदर्शक हों। 
- खंड पांच : आगामी रणनीति
इस खंड में विभाग द्वारा जेंडर मुद्दों को प्रमुखता से विभागीय नीतियों, कार्यक्रमों और योजनओं में शामिल करने के लिए भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों तथा पहलुओं का उल्लेख होगा। 
उदाहरण : राष्ट्रीय कृषि नीति में जेंडर सरोकारों को कृषि तथा उससे जुड़े अन्य मुद्दों में महिलाओं की क्षमता व विकास, उत्पादन संसाधनों तक उनकी पहुंच, नियंत्रण तथा स्वामित्व के लिए गंभीरता से प्रयास किए जा रहे हैं। 
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प्रत्येक विभाग द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने वाले अपने वार्षिक प्रतिवेदन में जेंडर बजट से संबंधित मुद्दों के लिए एक चैप्टर शामिल करने के लिए कहा गया है। इसके लिए कुछ मार्गदर्शक बिंदू विभागों को सुझाए गए हैं। 
डॉ. अमिताभ अवस्थी, उप सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग, मप्र शासन

मप्र में ‘देवदासी’ को लेकर गंभीर नहीं सरकार

- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कुप्रथा पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए- विदिशा, रायसेन और राजगढ़ जिलों में जारी है यह प्रथा

डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

मप्र के कुछ जिलों में ‘देवदासी’ प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। देवदासी यानी महिलाओं से वैश्यावृत्ति कराने की परंपरा। मप्र के रायसेन, विदिशा और राजगढ़ जिलों के कुछ गांवों में यह कुप्रथा सर्वाधिक है जबकि कुछ अन्य जिलों में भी कहीं-कहीं यह जारी है। मुख्यत: नट और बेड़िया समाज की इस कुप्रथा पर समय-समय पर मीडिया रिपोर्ट आने के बाद भारत सरकार ने गंभीर रुख अख्तियार किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में मप्र सरकार से कहा है कि इस कुप्रथा पर तत्काल रोक लगाने, पुनर्वास करने और महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने को कहा है।

हाल ही में गृह मंत्रालय का यह पत्र राज्य के मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव गृह का मिला है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि देवदासी प्रथा का किसी भी रूप में बने रहना पूरी तरह से आईपीसी की धारा 370 व 370-ए का उल्लंघन है। इस पत्र में कहा गया है कि देवदासी प्रथा अमानवीय है और महिलाओं के स्तर को गिराने वाले सबसे जघन्य अपराधों में से यह एक है। पत्र में कहा गया है कि विभिन्न पीआईएल और मीडिया में आई खबरों से पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में कुछ समुदायों, खासतौर पर बेड़िया और नट समुदायों में धार्मिक रीति रिवाज के नाम पर देवदासी प्रथा अभी भी चल रही है।
मप्र में ऐसी है स्थिति
विदिशा, राजगढ़ और रायसेन जिलों के साथ ही मध्यप्रदेश के पचासों गांवों में यह गंदा काम हो रहा है। देह बेचकर घर-बार चलाना उनकी मजबूरी है, जो परंपरा बनकर वर्षों से चली आ रही है। कई गांवों में सिर्फ बेटियों से ही देह व्यापार कराया जाता है, बहूओं को इससे दूर रखते हैं। बेड़िया जाति का परंपरागत नृत्य राई भी इसी कारण से बदनाम हुआ है। इसकी आड़ में देह व्यापार किया जाता है। यहां खुलेआम देह-मंडी सजती है। यहां रहने वालीं नट, बेड़िया के अलावा बछड़ा, कंजर और सांसी जातियों की में भी यह कुप्रथा होने की बात समय-समय पर सामने आई है। 
सरकार के प्रयास विफल
मप्र में ऐसी जातियों को अनुसूचित जाति, जनजाति एवं घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जातियों के रूप में चिन्हित किया गया है। पूर्व में सरकार ने इन कुप्रथा को खत्म करने के लिए इन समुदायों के लोगों को एक योजना के तहत जमीनें उपलब्ध करार्इं थीं लेकिन बंजर होने के कारण जमीनें इनके रोजगार का साधन नहीं बन पार्इं। वर्ष 2013 में मुख्यमंत्री निवास में विमुक्त घुमक्कड़ एवं अर्ध घुमक्कड़ जातियों की पंचायत बुलाई गई थी, जहां इन जातियों के विकास के लिए घोषणाएं हुर्इं थीं। 
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मप्र में विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जातियों के विकास, कल्याण, शैक्षिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए मप्र सरकार लगातार काम कर रही है। इन समुदायों के बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए नए छात्रावास तैयार किए गए हैं। रोजगार के साधन उपलब्ध कराएं जा रहे हैं। इन समुदायों की ऐसी परंपराओं के प्रति जागरूक किया जा रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने जो निर्देश दिए हैं, उनका सख्ती से पाल भारत सरकार के निर्देशों का पालन सख्ती से कराया जाएगा। 
ज्ञान सिंह, मंत्री विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ विभाग, मप्र 

सरकार फेल, किसान जीते

- सरकार नहीं बना पाई कृषि को लाभ का धंधा, छोटे किसानों ने बनाया
- 90 डिसमिल जमीन से ही निकाली तरक्की की राह
डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com
पिछले 10-12 सालों से प्रदेश में खेती को लाभ का धंधा बनाने की कोशिशों में जुटी मप्र सरकार भले ही अब तक इस काम को नहीं कर पाई है लेकिन प्रदेश में ऐसे सैकड़ों किसान हैं जिन्होंने अपने बल-बूते इस काम को कर लिया है। इनमें से अधिकांश ऐसे किसान हैं जो बहुत छोटे-छोटे रकबे में खेती कर रहे हैं। खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए सरकार के दावों और भाषणबाजी से दूर यह किसान अपने खेतों में छोटे-छोटे नवाचार करते हैं, नई-नई फसलें लेते हैं और खेत के हरेक हिस्से का पूरा उपयोग करते हैं। इसी का नतीजा है कि जहां प्राकृतिक आपदा के बाद भी कुदरत इन पर मेहरबान है। यह न तो सरकार के किसी एक्शन प्लान का हिस्सा हैं और न ही इन तक कोई बड़ी सरकारी मदद पहुंचती है। इसके बावजूद इन्होंने खेती को लाभ का धंधा बना लिया है। इन किसानों की सफलता के पीछे इनकी नवाचारी सोच तो है ही, इन्होंने अपने खेतों में खुद मजदूरी भी की। 

90 डिसमिल में कुंवर के कमाल
हरदा जिले के गांव छिदगांव तमोली के छोटे किसान कुंवर सिंह राजपूत की समृद्धि छोटी जोत के किसानों के लिए बड़ा उदाहरण है। केवल 90 डिसमिल जमीन में कुंवर ने विविध प्रकार की बागवानी फसलें लगाकर न केवल मुनाफा कमाया बल्कि खेती को एक नया आयाम भी दिया है। कुंवर ने अपने इस छोटे से खेत में तीन प्रकार की सबिज्यां लगार्इं। इसमें से तीन सब्जियां लौकी, कद्दू और गिलकी सिर्फ खेत की बागुड़ पर लगाई। इस बार उन्होंने बागुड़ पर लौकी से ही पांच हजार कमाएं हैं। उनके खेत में 10 किलो तक की लौकी आ चुकी है।  इस छोटे से खेत में प्याज की पौध, मक्का और चना लगाकर वे खुशहाली की तरफ बढ़े। 
उमा की मेहनत का रंग
इसी गांव की निवासी उमादेवी अपने छोटे से खेत में अपनी पति की मदद करती है। छोटे से खेत से निकलने वाली पत्तियों और सब्जियों से वे गाय और भैंस पाल रही हैं। यह उनके परिवार की आमदनी का अतिरिक्त स्रोत बन गया। 
और ये किसान भी हैं मिसाल
भजन सिंह सिंधा - भिंडी, ज्याज लहसुन की खेती। 
ह्रदयराम राजपूत - सब्जियां लगार्इं। बेचने तक का काम खुद ही।
अमरदास ढोके - हल्दी लगाई, मुनाफा कमाया
सुंदरलाल सैनी - सौताड़ा गांव में सैनी और उसका परिवार शकरकंद, रतालू और सब्जियों की खेती से मालामाल है। 
हर जिले में ऐसे किसान
प्रदेश के लगभग हर जिले में ऐसे किसान हैं, जो छोटे-छोटे नवाचारों से खेती को अपने लिए लाभ का धंधा बना चुके हैं। चूंकि यह छोटे बहुत किसान हैं, इसलिए सरकार तक इनकी पहुंच नहीं है और न ही यह चर्चा में आ पाते। हरदा, होशंगाबाद, मंडला, डिंडोरी, शहडोल, श्योपुर, अलीराजपुर, धार, बड़वानी में ऐसे किसानों की संख्या अधिक है।
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मजदूरी ने भी बढ़ाई कृषि लागत
जिन लोगों ने खेती को लाभ का धंधा बनाया है, उनके अनुभव बताते हैं कि महंगी मजदूरी के कारण खेती घाटे का सौदा बन गई है। कृषि कार्य के लिए गांवों में मजदूर नहीं मिल रहे हैं। जिसके कारण मजदूरी कई गुना अधिक हो गई है। जो किसान खेती से लाभ प्राप्त कर रहे हैं, वह मजदूरों पर निर्भर नहीं है। अपने खेत के अधिकांश काम वे खुद ही करते हैं। 
मनरेगा पर सवाल
इधर गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए बनी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार (मनरेगा) योजना है। इसमें सरकार ग्रामीणों को न्यूनतम 100 दिवस का रोजगार उपलब्ध कराती है और प्रति कार्यदिवस 160 रुपए मजदूरी देती है। किसानों और कृषि क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं का सुझाव है कि राज्य सरकार मनेरगा को कृषि कार्यों से भी जोड़ दे। यदि किसी किसान को मजदूर की जरूरत है तो उसे ग्राम पंचायत के माध्यम से मनरेगा मजदूर उपलब्ध कराए जाएं। मजदूरों को 200 प्रति कार्य दिवस मजदूरी दी जाए जिसमें से राज्य सरकार और संबंधित किसान 50-50 प्रतिशत की भागीदारी करे। इससे मजदूर को मजदूरी भी ज्यादा मिलेगी और किसानों को भी 100 रुपए में मजदूर मिल जाएंगे। इससे मनरेगा योजना की उपयोगिता बढ़ेगी। 
कृषि मजदूरी बराबर मनरेगा मेहनताना
इधर दो दिन पहले भारत सरकार ने मनरेगा में मजदूरी की दर कृषि मजदूरी के समान करने का मन बन लिया है। गुरुवार को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौ. बीरेन्द्र सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से गठित समिति की सिफारिश पर इसकी सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है। 
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मनरेगा में मजदूरी को लेकर दिशा-निर्देशा भारत सरकार द्वारा तय किए गए हैं। राज्य सरकार केवल योजना का क्रियान्वयन करती है। मनेरगा में मजदूरी के संबंध में हाल ही भारत सरकार ने कुछ निर्णय लेने जा रही है। 
- अरूणा शर्मा, अपर मुख्य सचिव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास

हमने कम रकबे के किसानों को नवाचारी खेती के लिए प्रोत्साहित किया। अब किसान ऐसा कर रहे और लाभकारी खेती करने लगे हैं। कृषि को लाभकारी बनाने के लिए लागत मूल्य कम करना बेहद जरूरी है। लगातार महंगी होती मजदूरी बड़ा मुद्दा है, इस पर सरकार को विचार करना चाहिए। 
- अशोक गुर्जर, अध्यक्ष ग्रामीण विकास सहकारी सोसायटी, छिदगांव तमोली