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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

बाली : पैर नहीं पर हौंसले से दौड़ी

 - पोलियोग्रस्त महिला ने दिखाई नई राह
- दोहरे संघर्ष से जीती जिंदगी की जंग
Keyword : Women Empowerment, NRLM, Sirvaiyya@gmail.com, Alirajpur
भोपाल                  
महिलाओं के संघर्ष और इसके बाद उनकी सफलता की वैसे तो अनेक कहानियां हैं लेकिन बाली की कहानी कुछ अलग है। उसका संघर्ष दोहरा है। गरीबी और सामाजिक कुरीतियों के साथ-साथ उसने विकलांगता के दंश को भी हिम्मत से झेला है। यही वजह है कि पोलियो के कारण ठीक से नहीं चल पाने वाली बाली की हिम्मत के आगे कामयाबी भी उसके कदम चूम रही है। 
अलीराजपुर के सोंडवा विकासखंड के गांव लोढ़नी की बाली फेलिया जन्म से विकलांग है। गरीबी और अभावों भरा जीवन उसे विरासत में मिला था। कुछ समय पहले तक स्थिति यह भी थी कि बाली के परिवार में दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं था लेकिन आज उसका जीवन पूरा बदल गया है। यह बदलाव उसके हौंसलों का नतीजा है। 5वीं तक पढ़ी लिखी बाली इसी विकलांगता के कारण आगे नहीं पढ़ पाई लेकिन जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाली बाली आज आर्थिक स्थिति के मामले में
अपने पैरों पर खड़ी है और विकलांग होकर भी अपने पूरे परिवार को पाल रही है। बाली के परिवार में पति फेरला डाबर के अलावा दो बच्चे हैं।
कैसे बदली जिंदगी
अगस्त 2013 में बाली के गांव में महिलाओं के स्व-सहायता समूह बनाए जा रहे थे। महिलाओं को बचत करने और इसके लाभ बताए जा रहे थे। बाली भी समूह की सदस्य बन गई। उसे हिम्मत मिली और वह समूह से जुड़कर छोटी-छोटी बचत करने लगी। उसने समूह से दो-दो, तीन-तीन हजार रुपए के छोटे-छोटे ऋण लिए और काम शुरू किया। समय पर ऋण वापस भी कर दिया। यह समूह ग्रामीण आजीविका मिशन के थे। समूह के माध्यम से ट्रेनिंग लेकर उसने कपड़ों की कटिंग और सिलाई का हुनर सीखा और सितंबर 2014 में समूह से पांच हजार का ऋण और दो हजार अपनी बचत से मिलाकर सात हजार में सिलाई मशीन खरीद ली। बस यहीं उसकी जिंदगी में बदलाव की शुरूआत हो गई। वह महीने में तीन से चार हजार रुपए कमाने लगी। बाली और उसका पति, दोनों मिलकर गांव के लगभग 450 परिवारों के लिए सिलाई का काम करते हैं। 
लखपति बन गई बाली
सिलाई के काम से अच्छी कमाई होने के बाद बाली के पति ने पास के गांव उतावली में किराने की दुकान खोल ली। इसके लिए बाली ने समूह से 26 हजार ऋण लिया। किराना दुकान से हर महीने साढेÞ चार से पांच हजार, सिलाई के काम से 7500-9000 रुपए की मासिक आय होने लगी। बाली ने छोटी कृषि भूमि ली और इस पर कृषि से 20 से 25 हजार रुपए सलाना अतिरिक्त आय प्राप्त की। इस प्रकार अब बाली की वार्षिक आय एक लाख 65 हजार तक पहुंच गई है। अब बाली रेडीमेड कपड़ों का कारोबार शुरू करने की योजना बना रही है। 

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

दिल्ली में होम टू होम डिलेवर होंगे आजीविका प्रोडक्ट

- शुरूआत गुड़गांव और एनसीआर से होगी
- शहडोल के 50 युवाओं को मिलेंगी जिम्मेदारी
डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625, sirvaiyya@gmail.com
 मप्र में राज्य आजीविका मिशन के तहत किसानों की 26 कंपनियों और स्व-सहायता समूहों के प्रोडक्ट अब दिल्ली में बिकेंगे। इन प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए शुरूआत में मप्र से 50 उन गरीब परिवारों के युवाओं को भेजा जाएगा जो फिलहाल रोजगार की तलाश में हैं। इसके लिए राज्य सरकार ने दिल्ली की संस्था जय किसान और आजीविका मिशन से जुड़े किसानों की कंपनियों के बीच अनुबंध कराया है। 
गुड़गांव और एनसीआर में आजीविका प्रोडक्ट्स की बिक्री के लिए संस्था आउटलेट खोलेगी। अगले छह महीने में दिल्ली में ऐसे 20 आउटलेट्स खोले जाएंगे। इसके साथ ही एक कॉल सेंटर भी रहेगा। फिलहाल गुड़गांव की रहवासी कालोनियों को टारगेट किया जाएगा और वहां आजीविका प्रोडक्ट्स की जानकारी पहुंचाई जाएगी। आगे चलकर एनसीआर में यह आउटलेट खोले जाएंगे। गुड़गांव और एनसीआर में रहने वाला कोई भी व्यक्ति या परिवार जय किसान के कॉल सेंटर पर प्रोडक्ट्स की बुकिंग करा सकेगा। बुकिंग कराने के कुछ देर बाद प्रोडक्ट की डिलेवरी उनके घर पर कर दी जाएगी। समूह होम टू होम डिलेवरी के लिए इन 50 युवाओं को पहले ट्रेनिंग देगा और फिर इन्हें मोटर सायकिल से बनाए गए डिलेवरी वाहन दिए जाएंगे। मोटर साइकिल से यह युवा प्रोडक्ट की होम डिलेवरी करेंगे। इनमें जीपीएस सिस्टम होगा ताकि इनकी लोकेशन की जानकारी मिलती रहे और यह दिल्ली की सड़कों पर भटकें नहीं। 
गांव से दिल्ली कैसे पहुंचेंगे प्रोडक्ट
राज्य आजीविका मिशन ने 26 जिलों में किसानों और स्व-सहायता समूहों की कंपनियां बनार्इं हैं। गुड़गांव और एनसीआर में आजीविका प्रोडक्ट्स बेचने के लिए जय किसान संस्था और इन कंपनियों के बीच मिशन ने अनुबंध कराया है। किसानों के खेत से निकलकर अनाज, सब्जियां एवं अन्य उत्पादों को किसानों की कंपनी के पास पहुंचेंगे और यहां पैकेजिंग करके यह सामान जय किसान संस्था को सौंप दिया जाएगा। सामान की कीमत संस्था उसी समय कंपनी को चुका देगी। 
किसानों को लाभ 
अभी किसानों को उनके उत्पादों की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती थी। किसान इनका वेल्यू एडीशन नहीं कर पाते और बड़े बाजारों में नहीं पहुंचा पाते। जय किसान संस्था विभिन्न प्रोडक्ट को मंडी रेट से 15 प्रतिशत या इससे अधिक दर पर खरीदेगी। दूसरा लाभ किसानों के सभी प्रोडक्ट आजीविका ब्रांड के नाम से बिकेंगे। यह किसानों का अपना ब्रांड है।
आठ हजार तनख्वाह
जिन 50 युवाओं को पहले दौर में भेजा जाएगा उन्हें समूह आठ हजार रुपए मासिक वेतन देगा। इसके अलावा इनके रहने और दोनों वक्त के भोजन की व्यवस्था की जाएगी। राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ने अगले छह महीने में प्रदेश से 200 बेरोजगारों को दिल्ली भेजकर इस काम से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। इसी तरह दिल्ली में शुरूआती तौर पर 10 हजार ग्राहक बनाने का लक्ष्य भी तय किया गया है। 
ये हैं आजीविका प्रोडक्ट
शबरती आटा, बेसन, मिर्ची, हल्दी, धनिया, अचार, मुरब्बा, गुड़, शहद, दालें, पायदान, कारपेट, मिट्टी के बर्तन, चूड़ियां, अगरबत्ती, हैंडलूम आयटम, सब्जियां, चना, मूंगफली, वाशिंग पावडर, साबुन, सेनेटरी नेपकिन सहित 108 अन्य प्रोडक्ट।
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प्रोडक्ट्स की डिजिटल ब्रांडिंग होगी, मंत्री करेंगे खरीदने की अपील
गोपाल भार्गव
गुड़गांव और एनसीआर में आजीविका प्रोडक्ट्स की डिजिटल ब्रांडिंग की जाएगी। इसके लिए जय किसान संस्था ने बकायदा पूरा कैंपेन तैयार किया है। मंगलवार को पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने इस कैंपेन की लांचिंग की। इस कैंपेन में आजीविका प्रोडक्टस की जानकारी ई-मेल, एमएमएस, फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब आदि सोशल मीडिया प्लेटफार्म से की जाएगी। यू-ट्यूब पर आजीविका प्रोडक्टस को लेकर एक वीडियो फिल्म दिखाई देगी। इस वीडियो फिल्म में मंत्री भार्गव और विभागी की एसीएस अरूणा शर्मा आजीविका प्रोडक्ट्स की खूबियों को बताकर इन्हें खरीदने की अपील भी कर रहे हैं। 
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दिल्ली में आजीविका प्रोडक्ट जय किसान समूह के माध्यम से बेचने की योजना है ताकि किखसानों और समूह की महिलाओं को उनके प्रोडक्ट का सही दाम मिल सके। शुरूआती तौर पर शहडोल जिले से 50 बेरोजगार युवाओं को दिल्ली भेजा जा रहा है। यह दिल्ली में होम टू होम डिलेवरी करेंगे। 
एलएम बेलवाल, मिशन संचालक, एनआरएलएम

मप्र में आजीविका मिशन के माध्यम से किसान कई तरह के उत्पाद तैयार कर रहे हैं और इनकी क्वालिटी भी अन्य उत्पादों से बेहतर है। हमारी संस्था गुड़गांव और एनसीआर में इन उत्पादों की होम टू होम डिलेवरी करेगी। हम 24 राज्यों में 60 हजार किसानों से जुड़कर पहले से काम कर रहे हैं। 16 सितंबर तक आजीविका प्रोडक्ट्स के करीब 10 हजार कस्टमर तैयार करने का लक्ष्य हमने रखा है।
संजीव शर्मा, संस्थापक, जय किसान

सोमवार, 31 अगस्त 2015

प्रशासन में हिन्दी के कलमकार

राजधानी भोपाल में अगले महीने विश्व हिंदी सम्मेलन होने जा रहा है। दुनिया भर से हिंदी बोलने वाले, पढ़ने वाले और इस भाषा को जानने वाले इस सम्मेलन में जुट रहे हैं। मप्र के प्रशासनिक क्षेत्र में हिंदी सेवियों की लंबी श्रृंखला है। इन्होंने साहित्यिक रूप से तो हिंदी को समृद्ध किया है, सरकारी कामकाम में भी हिंदी के उपयोग को बढ़ावा दिया है। कई अफसर हिंदी में कथा, कहानी, कविताएं लिखते हैं तो कई अफसर शुद्ध और  सुलेख लेखन के लिए जाने जाते हैं। 
‘पहाड़ी कोरबा’
वर्ष 1987 बैच के आईएएस मनोज श्रीवास्तव का हिन्दी के प्रति अगाथ प्रेम है। यही कारण है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य से एमए भी किया है। भले ही उनकी अंग्रेजी भाषा पर भी अच्छी पकड़ है, लेकिन वे हमेशा से सरकारी कामकाज के अलावा अन्य विशेष आयोजनों में हिन्दी को ज्यादा अपनाने पर जोर देते रहे हैं। उनकी खुद भी हिन्दी लेखन में बेहद गहरी दिलचस्पी है। वे अब तक हिन्दी की कई पुस्तकें लिख चुके हैं। इनमें 7 पुस्तकें कविता की हैं और 12 पुस्तकें सुंदरकांड पर लिखी हैं। इनके अलावा ‘शक्ति प्रसंग’, ‘पंचशील’, ‘पहाड़ी कोरबा’, ‘व्यतीत’, ‘वर्तमान और वैभव’, ‘यथाकाल’ और ‘शिक्षा में संदर्भ और मूल्य’ रचना भी उन्होंने लिखी है। वे व्यस्तता को बहुत कीमती मानते हैं और यह व्यस्तता उनके कैनवास को समृद्ध बनाती है। 
‘बात का बतंगड़’
वर्ष 1985 बैच के आईएएस विनोद सेमवाल के लिए हिन्दी बेमिसाल है। वे अन्य लोगों को भी हिन्दी भाषा अपनाने की नसीहत देते हैं। उन्हें खुद भी हिन्दी लेखन का बेहद शौक है और अब तक तीन पुस्तकें हिन्दी में लिख चुके हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘बात का बतंगड़’ 1996 में, ‘साहब बहादुर’ 1998 में आई थी। तीसरी पुस्तक ‘पुतलों की फजीहत’ 2015 में आई है। उनकी पुस्तकें व्यंग्य पर आधारित हैं, लेकिन वर्तमान में वे एक पुस्तक कहानी पर लिख रहे हैं। लेखन एवं पढ़ने के प्रति उनकी दिलचस्पी बचपन से रही है। बचपन में वे पत्र-पत्रिकाओं में पत्र संपादक के नाम एवं आर्टिकल लिखते थे, लेकिन सिविल सर्विस में आने के बाद से उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में लिखना बंद कर दिया। इसके पीछे समय नहीं रहना सबसे बड़ा कारण रहा, लेकिन उन्होंने लिखने की आदत आज तक नहीं छोड़ी। 

‘21 बिहारी एक मद्रासी’
वर्ष 1982 बैच के आईएएस के. सुरेश मूलत: साउथ इंडियन हैं और उनकी अंग्रेजी के अलावा स्थानीय भाषा पर भी अच्छी पकड़ है। इसके बावजूद भी हिन्दी लेखन उन्हें सुकून देता है। वे सरकारी कामकाज में भी हिन्दी भाषा को ज्यादा तवज्जो देते हैं। उन्होंने अब तक दो पुस्तकें लिखी हैं, इनमें ‘21 बिहारी एक मद्रासी’ और ‘न की जीत हुई’। वे वर्तमान में भी एक पुस्तक पर काम कर रहे हैं, जो कि जल्द ही प्रकाशित होने की उम्मीद है। वैसे तो बचपन में उनकी परवरिश दक्षिण भारतीय परिवार में हुई, लेकिन उनकी दोस्ती हिन्दी भाषी लोगों से ज्यादा रही है। हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान होने का कारण भी यही है। व्यवस्ताओं के बीच में वे सुबह-शाम लेखन के लिए समय निकालते हैं। इसके अलावा उन्हें बर्ड वाचिंग करना भी बेहद अच्छा लगता है। 
‘धुनों की यात्रा’
वर्ष 1990 बैच के आईएएस पंकज राग हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भी हैं। साहित्य और सिनेमा, दोनों तरह के लेखन में उन्हें महारत हासिल है। साहित्यिक हिंदी की बात हो या कार्यालयीन हिंदी, दोनों में वे हिंदी के आदर्शों और मानकों का अनुसरण करते हैं। मूलत: बिहार के रहने वाले पंकज राग की प्रमुख कृतियां ‘भूमंडल की रात है’ और ‘धुनों की यात्रा’ है। धुनों की यात्रा के लिए उन्हें प्रतिष्ठित केदार सम्मान से सम्मानित किया गया है। उनके कविता संग्रह की एक से आठ की श्रृंखला प्रकाशित हो चुकी है। ‘यह भूमंडल की रात है’ की कविताएं लंबे समय से पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। पंकज की कविताएं उनके जीवन के भीतर से उपजी हुई कविताएं हैं। पंकज राग के साथ ‘धुनों की यात्रा’ पर निकलना किसी भी व्यक्ति के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन सकता है। यह पुस्तक 1931 से 2005 तक के संगीतकारों पर केंद्रित है। पंकज राग को कविताएं लिखने का शौक बचपन से ही था। 13 वर्ष की उम्र में ही बचपन की लिखित कविताओं का एक संग्रह ‘पंकज राग की कविताएं’ के नाम से 1978 में प्रकाशित हुआ। 
हिन्दी से गहरा लगाव

वर्ष 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी पवन जैन का भी हिन्दी के प्रति बेहद गहरा लगाव है। वे हिन्दुस्तान के कई बड़े मंचों से हिन्दी में कविता पाठ कर चुके हैं। उन्होंने अपनी रचनाएं दिल्ली के लाल किले से भी पढ़ी है। कवि सम्मेलनों के प्रति उनकी दिलचस्पी बचपन से रही है। जब वे बचपन में गांव में रहते थे तो वहां एवं आसपास होने वाले सभी कवि सम्मेलनों को सुनने जाते थे। 

‘उम्र की 21 गलियां’
वर्ष 2004 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव शर्मा हिन्दी साहित्य और सम्मेलनों के प्रमुख चेहरे हैं। उनके तीन कविता संग्रह ‘उम्र की 21 गलियां’, ‘धूप के ग्लेशियर’, और ‘प्रिज्म’ प्रकाशित हो चुके हैं।वर्ष 2011 में मंडला पर उनकी किताब ‘युग-युगीन मंडला’ प्रकाशित हुई थी। शर्मा अभी आदि शंकराचार्य पर एक उपन्यास लिखने की तैयारी कर रहे हैं। हिन्दी भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत है। 
प्रशासनिक कामकाज में भी हिंदी को बढ़ावा दे रहे हैं। अन्य को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। 

अनुपम राजन
वर्ष 1993 बैच के आईएएस अधिकारी और आयुक्त जनसंपर्क अनुपम राजन हिन्दी में शुद्ध लेखन के लिए जाने जाते हैं। प्रशासनिक गलियारों में उनकी हिन्दी चर्चा में रहती है। खासकर लेखन के मामले में। शुद्ध और सुलेख हिन्दी उनकी पहचान बन गई है। उनका वाक्य विन्यास उत्कृष्ट है। व्याकरण की त्रुटियों की गुंजाईश नहीं होती। प्रश्नवाचक, विस्मयबोधक, पूर्ण विराम और अल्पविराम का वे बेहद ध्यान रखते हैं। सरकारी कामकाज में हिंदी का अधिकतम प्रयोग करते हैं। 

आईएनएस दाणी
हाल ही में रिटायर हुए मप्र कॉडर के वरिष्ठ अधिकारी इंद्रनील शंकर दाणी मप्र की नौकरशाही में हिंदी के खासे जानकार थे। उन्होंने मप्र के पूर्व मुख्य सचिव रहे स्व. आरपीव्हीपी नरोन्हा द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई किताब ‘टेल टोल्ड बाय एन इडियट’ का हिन्दी में अनुवाद किया है।
  अश्विनी कुमार राय
वर्ष 1990 बैच के आईएएस और पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव अश्विनी कुमार राय की हिंदी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय रहती है। सरकारी कामकाज में हिन्दी के शुद्ध के साथ-साथ कठिन माने जाने वाले शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। राय हिन्दी के अच्छे जानकार हैं। 
अनुराग जैन
1989 बैच के आईएएस अधिकारी एवं वर्तमान में पीएमओ में संयुक्त सचिव अनुराग जैन का हिन्दी से लगाव रहा है। वे हिन्दी में शुद्ध लेखन करते हैं। कार्यालीयन हिन्दी में भी उनके वाक्य, विन्यास और व्याकरण की दृष्टि से श्रेष्ठ होते हैं। उनकी हिन्दी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा में रहती है।


हरिरंजन राव
वर्ष 1994 बैच के आईएएस और मुख्यमंत्री के सचिव हरिरंजन राव की अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी भाषा पर भी खासी पकड़ है। राव का न केवल हिन्दी लेखन बहुत शुद्ध है, बल्कि उनकी हिन्दी लेखनी काफी सुंदर हैं। नोटशीट पर हिंदी में लिखी गई उनकी टिप्पणी के अक्षर बेहद कलात्मक होते हैं।
संजय शुक्ला
1994 बैच के आईएएस और मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के सीएमडी संजय शुक्ला भी हिन्दी के मामले में प्रशासनिक गलियारों में जाने जाते हैं। हिन्दी के बेहद संतुलित और छोटे वाक्यों का उपयोग वे सरकारी कामकाज में करते हैं। लेखन शुद्ध है और भाषा पर खासी पकड़ है। 


अशोक भार्गव
वर्ष 2002 बैच के आईएएस अधिकारी और शहडोल कलेक्टर अशोक कुमार भार्गव भी उनके हिंदी प्रेम के लिए जाने जाते हैं। उन्हें हिंदी ह्रदय सम्राट भी पुकारा जाता है। सरकारी कामकाज में शुद्ध हिन्दी लेखन तो करते ही हैं, लेख और कविताएं भी वे अक्सर लिखते रहते हैं। 
जीपी श्रीवास्तव
वर्ष 1997 बैच के आईएएस अधिकारी जीपी श्रीवास्तव हिन्दी में कविताओं और कहानियों के लेखन के शौकीन हैं। वे अब तक हिन्दी में 100 से ज्यादा कविताएं और 28 कहानियां लिख चुके हैं। उनका हिन्दी प्रेम सरकारी कामकाज में भी दिखाई देता है और ज्यादातर काम हिंदी में करते हैं।
कवींद्र कियावत
वर्ष 2000 बैच के आईएएस अधिकारी और उज्जैन जिले के कलेक्टर कवींद्र कियावत हिन्दी के मामले में भी चर्चित अफसर हैं। वे न केवल अच्छी हिन्दी लिखते हैं, बल्कि बोलते समय भी हिन्दी के बेहतर शब्दों का प्रयोग करते हैं। संवाद में बोलचाल और साहित्यिक हिंदी का पुट है। 
पुखराज मारू
सेवानिवृत्त हुए आईएएस अधिकारी डॉ. पुखराज मारू हिंदी के लेखकों में शुमार हैं। डॉ. मारू की पुस्तक ‘ग़ज़लें धूप-छाँव की’ के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। हिन्दी ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता’ उनके महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यों में से एक हैं। 
लाजपत आहूजा
मप्र जनसंपर्क के संचालक रहे और वर्तमान में माखनलाल चतर्वुेदी पत्रकारिता विवि के रैक्टर लाजपत आहूजा की गैर हिंदी भाषी होने के बावजूद हिंदी पर बेहतर पकड़ है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने उन्हें हिंदी सम्मान से सम्मानित किया है। हिंदी में आर्थिक विषयों पर बेहतर लेखन करते हैं। 


मंगलवार, 25 अगस्त 2015

अमलतास, आमला और अश्वगंधा को बचाओ, 26 प्रजातियां संकट में

- जैव जगत/व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ियों को बचाने की कवायद
- जमुनापारी, साहीवाल और कड़कनाथ नस्लें भी संकट के दौर में
- संरक्षण के लिए सरकार ने बनाया एक्शन प्लान
- आला अफसरों को किया जाएगा सक्रिय
डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625, sirvaiyya@gmail.com

मप्र में जैव व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ियों के 25 से अधिक पौधे और करीब दो दर्जन से ज्यादा पौधों की प्रजातियां संकट में हैं। इसी तरह औषधीय पौधों की कई दुर्लभ प्रजातियां भी लुप्त होने की स्थिति में आ चुकी हैं। अमलतास, आमला, अश्वगंधा और सर्पगंधा जैसे पौधों की प्रजातियां और बकरी की जमुनापारी, गाय की साहीवाल और मुर्गे की कड़कनाथ जैसे पशुओं नस्लों को बचाना मुश्किल हो रहा है। मप्र राज्य जैव विविधता बोर्ड की मानें तो इन महत्वपूर्ण घटकों का लुप्त होना जैव विविधता के लिए हर सूरत में हानिकारक है। इसलिए इनका संरक्षण जरूरी है। केंद्र और राज्य सरकार इस दिशा में सक्रिय हैं, इसलिए जैव घटकों के दोहन के लिए नियम-प्रक्रियाओं और कानून बनाए गए हैं। लोगों को जागरूक किया जा रहा है ताकि इनका संरक्षण हो सके। 
पौधों की इन प्रजातियों पर संकट

अडॅूसा, बील, चिरायता, सतावर, सिंदुर, अमलतास, गूग्गल, आंवला, गधा पलाश, कैथा, कृष्णावट, गुलर, खिरनी, हरिचंपा, मीठी नीम, हार सिंगार, सोनापाठा, कनकचंपा, सर्पगंधा, सीता अशोक, अर्जुन, बहेड़ा, गिलोय, परासपीपल, निर्गुन्डी और अश्वगंधा।
ये भी संकट के दौर में
कठिया गेहूं, कपूरी धान, देशी मंूग, मुर्गे की कड़कनाथ नस्ल, बकरी की स्थानीय नस्ल जमुनापारी, गाय की देशी नस्ल साहीवाल, नोनी एवं अचार के पौधे।

बचाने की कवायदें
जैव विविधता बोर्ड ने पौधों की लुप्त होती 25 प्रजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों, अशासकीय संस्थाओं के साथ-साथ ग्रामीणों को सहारा लिया है। बोर्ड ने हाल ही इन 25 प्रजातियों के सात हजार से ज्यादा पौधे बांटे। जिन्हें पौधे बांटे गए उन्हें इनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी दी गई। बोर्ड ऐसे सभी इच्छुक व्यक्तियों और संस्थाओं को इन प्रजातियों के पौधे उपलब्ध करा रहा है जो इनके संरक्षित करना चाहते हैं। 

आला अफसरों को जिम्मेदारी
जैव विविधता के संरक्षण के लिए राज्य सरकार वन विभाग के आला अफसरों को सक्रिय करने जा रही है। जैव विविधता बोर्ड ने इसके लिए एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके तहत 31 अगस्त और एक सितंबर को भोपाल में सीसीएफ, सीएफ और डीएफओ स्तर के भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को इस एक्शन प्लान की जानकारी और ट्रेनिंग दी जाएगी। इन्हें जैव विधिवता के प्रत्येक पहलू और संरक्षण के लिए बने नियम-कानूनों पर देशभर से बुलाए गए विद्वान ट्रेनिंग देंगे। टेÑनिंग देने के लिए नेशनल लॉ स्कूल बैंगलुरु के डॉ. एमके रमेश, आईआईएफएम भोपाल के प्रो. अभय पाटिल, लॉ यूनिवर्सिटी के डॉ. एल पुष्पकुमार और वनस्पतिशास्त्री एके कान्डया प्रमुख हैं। 
मैदानी अमले को भी ट्रेनिंग
संरक्षण के लिए बने एक्शन प्लान में वन रक्षक सहित वन विभाग के मैदानी अमलों को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। इससे पहले इन्हें जैव विविधता के मायने और महत्व समझाया जा रहा है। वन विभाग स्कूल और कॉलेजों में वन रक्षकों को जैव विविधता की आवश्यकता, मप्र में स्थिति, नष्ट होती प्रजातियों-नस्लों की जानकारी देकर इस दिशा में किए जाने वाले कार्यों और उनसे सरकार की अपेक्षाओं पर विस्तृत ट्रेनिंग दी जा रही है। 
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पौधों की 25 से अधिक प्रजातियां, पशुओं की नस्लें और परंपरागत अनाज की विभिन्न किस्में लुप्त होने की स्थिति में हैं। जैव विविधता के संरक्षण के लिए हम मैदानी अमले से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक को ट्रेनिंग दे रहे हैं। संरक्षण के लिए कई जिलों में तेजी से काम किया जा रहा है। हमारी कोशिश है कि हम लुप्त हो रही सभी प्रजातियों और नस्लों को बचाएं। इसके लिए हम जनसहयोग भी ले रहे हैं। हाल ही में हमने सात से अधिक ऐसे पौधे बांटें हैं जो लुप्त होती प्रजातियों के हैं। कोई भी इच्छुक व्यक्ति यह पौधे बोर्ड से प्राप्त कर सकता है। 
डॉ. एसपी रयाल
सदस्य सचिव, मप्र राज्य जैव विविधता बोर्ड

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

मैं गरीब नहीं हूं...

- प्रदेश के युवक ने पेश की मिसाल
- गरीबी रेखा से अपना नाम हटाने कलेक्टर को दिया आवेदन
- 10 हजार कमाता है गंगाराम
डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संपन्न देश वासियों से अपील कर रहे हैं कि वे गरीबों के हक में रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ दें। इस अपील का अभी व्यापक असर होना बाकी है लेकिन इस बीच मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव से एक खबर निकली है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणा बन सकती है। एक तरफ सक्षम लोग सब्सिडी छोड़ने से कतरा रहे हैं तो यहां 10 हजार रुपए महीना कमाने वाले एक युवक को कोई गरीब कहे, ये बात उसे पसंद नहीं है। इसीलिए उसने सरकार से कह दिया है कि उसका नाम गरीबी रेखा (बीपीएल) की सूची से हटा दिया जाए।

मप्र के आगर-मालवा के ग्राम छन्देड़ा के रहने वाले 34 साल के इस दलित युवक का नाम गंगाराम सूर्यवंशी है। गंगाराम ने 14 जुलाई को जिले कलेक्टर को जनसुनवाई के दौरान एक आवेदन देकर उसका नाम गरीबी रेखा की सूची से हटाने का आग्रह किया है। वर्ष 2002-03 में गंगाराम का नाम जिले की बीपीएल सर्वे 21 पर दर्ज है। गंगाराम ने कलेक्टर से कहा कि अब उसकी मासिक आय 10 हजार रुपए हो गई है, अब मैं गरीबी रेखा की सूची से ऊपर हो गया हूं, इसलिए मेरा बार-बार यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि मैं अपने-आपको गरीब क्यों समझूं। मेरा नाम बीपीएल सूची से हटा दिया जाए ताकि मैं इस कुंठा से मुक्त हो सकूं। गंगाराम का कहना है कि अब वह अन्य लोगों को भी इस दिशा में प्रेरित करना चाहता है ताकि जो लोग वास्तव में गरीब हैं, उन्हें उनके अधिकार मिल सकें।
गरीबी से संघर्ष
गंगाराम का अब तक जीवन गरीबी से संघर्ष करते हुए बीता है। पिता की अस्थाई आय के कारण परिवार में कभी भी अच्छे दिन नहीं रहे। गांव में मजदूरी से लेकर हर वह काम उसने किया, जिससे दो पैसे मिल सकें। पैसे कमाने के लिए उसने चित्रकारी करना भी सीख लिया है और यहीं से उसके जीवन में बदलाव का दौर शुरू हो गया। गंगाराम के परिवार में मां के अलावा पत्नी और दो बच्चे हैं। दोनों बच्चे पढ़ने जाते हैं। बकौल गंगाराम अब उसे किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। आगर के अनुसूचित छात्रावास में रहकर हायर सेकेण्डरी करने वाले गंगाराम ने हाल ही में बीए की परीक्षा भी पास कर ली है। 
सारा श्रेय डीपीआईपी को
गंगाराम अपनी ‘अमीरी’ का सारा श्रेय डीपीआईपी यानी इंदिरा गांधी गरीबी उन्मूलन परियोजना को देते हैं। डीपीआईपी का दल जब गांव में पहुंचा तो उसकी नजर गंगराम की चित्रकारी पर पड़ी। परियोजना के प्रचार-प्रसार का काम मिल गया। उसने गांव में छह लोगों का एक समूह बनाया, सिलाई का काम सीखा। डीपीआईपी ने उसे गांव के लिए रिसोर्स पर्सन बनाया। इन सबसे गंगाराम की आय शुरू हो गई। उसने वाटरशेड के काम का अनुभव लिया और इसी के साथ कई काम किए। 2006 में डीपीआईपी ने समर्थ किसान प्रोड्यूसर प्रायवेट लिमिटेड कंपनी गंगाराम को इससे जोड़ा। 2011 में उसे आजीविका मित्र बनाया। इन सभी से उसकी थोड़ी-थोड़ी आय होती रही। गंगाराम कहते हैं कि वर्तमान में उसे कंपनी से जुड़कर 8 हजार रुपए हर महीने मिलते हैं। इस कंपनी के माध्यम से गांव स्तर पर खरीदी-बिक्री करवाता हूं जिसके कमीशन के रूप में दो हजार रुपए तक हर महीने मिल जाते हैं। इस तरह उसकी आय अब 10 हजार रुपए महीना हो गई है। 
गंगाराम को बनाएंगे ब्रांड एंबेस्डर
डीपीआईपी के परियोजना समन्वयक एलएम बेलवाल कहते हैं कि डीपीआईपी परियोजना में ऐसे कई हितग्राही हैं जो गरीबी से जूझ रहे थे लेकिन अब उनकी सलाना आमदनी एक लाख से अधिक हो गई है, इन्हें हमने लखपति क्लब में शामिल हैं। बेलवाल कहते हैं कि गंगाराम सूर्यवंशी को हम अपना ब्रांड एंबेस्डर बनाएंगे ताकि वह प्रदेश में भर जाकर लोगों को प्रेरित कर सके। 

150 से अधिक राशन कार्ड सरेंडर 
राजधानी भोपाल में बीपीएल कार्ड बनवाने के बाद करीब 150 बीपीएल कार्डधारकों ने अपने राशनकार्ड सरेंडर किए हैं। यह आंकड़ा पिछले तीन साल का है। इनमें कुछ शिक्षक से लेकर बड़े-बडेÞ दुकान व मकान स्वामी हैं। इनमें से कुछ ने स्वप्रेरणा से अपने बीपीएल कार्ड सरेंडर किए हैं तो कुछ ने कार्यवाही के डर से कार्ड जमा कर डाले हैं। पिछले साल 40 राशनकार्ड सरेंडर हुए। 

शनिवार, 18 जुलाई 2015

स्वच्छता और सम्मान के लिए दो कदम आगे

स्वच्छता के लिए जो किया जाए वह कम है। नए आईडिया और नई चीजों के इस्तेमाल से इस सोच को आगे बढ़ाने में और मदद मिलती है। मप्र में स्वच्छता अभियान में कुछ ऐसे ही नवाचार हो रहे हैं। भोपाल में बांस शिल्पकारों की बस्तियों में बांस के शौचालय यानी बैंबू टॉयलेट बनाने की तैयारी की जा रही है तो धार, अलीराजपुर, मंडला, डिंडोरी और राजगढ़ जैसे जिलों में लोग टायलेट के साथ बाथरूम भी बन रहे हैं। यहां महिलाएं कह रही हैं, खुले में शौच ही नहीं, नहाना भी गलत है........
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डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625

sirvaiyya@gmail.com
राजधानी की चार बस्तियों में बनेंगे 40 बैंबू टॉयलेट
राजधानी की बांसखेड़ी, टीलाजमालपुरा, इंदिरा नगर और अर्जुन नगर। इन गरीब बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग बांस का काम करते हैं। इन बस्तियों की पहचान जिस बांस से है, उसी से अब यहां शौचालय बनाए जाएंगे। ऐसा इसलिए भी किया जा रहा है ताकि बांस के परंपरागत उपयोग के साथ-साथ यहां के कारीगर इसके आधुनिक उपयोग की कला भी सीख सकें। 
मप्र राज्य बांस मिशन इन बस्तियों के कुल 40 बैंबू टायलेट बनाएगा। मप्र में इस तरह के टॉयलेट पहली बार बनेंगे। भोपाल में यह पायलट प्रोजेक्ट होगा। इनमें कमोड को छोड़कर सब कुछ बांस बनेगा। लागत करीब 15 हजार प्रति टायलेट होगी। खास बात यह है कि यह टॉयलेट किसी एजेंसी से नहीं बनवाए जाएंगे। इन बस्तियों में रहने वाले बांस शिल्पकारों को ही टायलेट बनवाए जाएंगे। इनका मार्गदर्शन वे संस्थाएं करेंगी भारत में इस तरह का काम कर रही हैं। इन बांस कारीगरों को टेÑनिंग देकर मास्टर ट्रेनर के रूप में तैयार किया जाएगा ताकि दूसरे स्थानों पर यही लोग बैंबू टायलेट बना सके। बैंबू टायलेट बनाने का यह काम स्वच्छ भारत मिशन के तहत होगा। 

भोपाल की चार बस्तियों को बैंबू टॉयलेट के लिए चयनित किया गया है। इनमें बांस शिल्पकार रहते हैं। इन्हीं से टायलेट बनवाए जाएंगे ताकि यह मास्टर ट्रेनर के रूप में तैयार हो सकें। बैंबू टायलेट किफायती हैं और पानी से यह खराब भी नहीं होते। 
- डॉ. एके भट्टाचार्य, मिशन संचालक, मप्र बांस मिशन
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शौच ही नहीं, खुले में नहाना भी ठीक नहीं
स्वच्छता के लिए स्वच्छ भारत अभियान में केवल टायलेट बनाने पर ही सबसे ज्यादा जोर है। यही काम पूरे प्रदेश में हो रहा है। गांव-गांव में घरों में शौचालय बनाए जा रहे हैं लेकिन  मप्र के अलीराजपुर, धार, राजगढ़, डिंडोरी और मंडला जिले में इससे एक कदम आगे जाकर काम हो रहा है। 
यहां महिलाएं कह रही हैं कि खुले में शौच करना ही गलत नहीं है, बल्कि खुले में नहाना भी सम्मान के खिलाफ है, इसलिए मप्र राज्य आजीविका मिशन ने टॉयलेट के साथ बाथरूम बनाने का मॉडल विकसित किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रति शौचालय निर्माण के लिए 12 हजार की राशि तय है। इसी राशि में बाथरूम बनाने के लिए मिशन ने यहां लोगों को प्रेरित किया। स्व-सहायता समूह अपनी बैठकों में शौचालय और बाथरूम बनाने का संकल्प पारित करते हैं। यह राशि सीधे उनके खातों में जमा की और इसमें संबंधित हितग्राही ने अपनी तरफ एक दो हजार और मिलाकर बाथरूम भी बना लिए। स्वच्छ भारत मिशन में यह देश में अपनी तरह का पहला मॉडल है। इन टायलेट और बाथरूम में टाईल्स लगाए गए हैं। इन शौचालयों के निर्माण में अधिकांश काम हितग्राहियों ने ही किया। 

स्वच्छ भारत मिशन के तहत 14 हजार शौचालय और इनके साथ बाथरूम भी बना रहे हैं। हमने पैसा सीधे हितग्राही के खाते में जमा किया। कुछ पैसा हितग्राही भी मिला रहे हैं। हम यह काम स्व-सहायता समूहों के माध्यम से कर रहे हैं। 
- एलएम बेलवाल, परियोजना संचालक, मप्र राज्य आजीविका मिशन

सोमवार, 29 जून 2015

जन-धन योजना के 60 प्रतिशत खाते खाली

- 70 लाख से ज्यादा लोगों ने नहीं दिखाई योजना में रुचि 
- एक नए पैसे का भी नहीं किया लेन-देन
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डॉ. अनिल सिरवैयां, भोपाल
9424455625
sirvaiyya@gmail.com

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जन-धन योजना में मप्र के लोगों ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। योजना के तहत खोले गए कुल बैंक खातों में से 60 प्रतिशत से अधिक खातों में कोई ट्रांजेक्शन (लेन-देन) नहीं हुआ। खाते जब से खुले हैं तब से खाली पड़े हैं। लोगों की ‘उपेक्षा’ ने बैंकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। योजना के तहत प्रत्येक खाताधारक को एक लाख के बीमा सुरक्षा दी गई है जिसके लिए खाते खुलने के 45 दिनों के भीतर कम से कम एक बार ट्रांजेक्शन होना जरूरी है। 
आपको बता दें कि प्रधानमंत्री जन-धन योजना के पहले चरण में मप्र में कुल एक करोड़ 20 लाख लोगों के बैंक खाते खुले हैं। यह खाते मार्च 2015 तक खोले गए थे। इस हिसाब से करीब 70 लाख लोगों ने अब तक अपने खातों की सुध नहीं ली है। हाल ही में राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक में इस मामले पर विभिन्न बैंकों ने अधिकारियों ने चिंता जताई है। बैंक अधिकारियों का कहना कि योजना को लेकर आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। यहां भी उल्लेखनीय है कि इनमें अधिकांश खातों को खुले हुए 45 दिनों से ज्यादा का समय हो चुका है। इस लिहाजा से ये खाताधारक एक लाख के दुर्घटना बीमा के लिए भी अपात्र हो चुके हैं। 
बीमा योजनाओं केवल 24 लाख कवर
प्रधानमंत्री जन-धन योजना के दूसरे चरण में 9 मई को लांच की हुर्इं प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और अटल पेंशन योजना में 16 जून तक प्रदेश में 73 लाख 81 हजार लोगों का ही बीमा हो पाया। इससे पहले 9 जून तक यह आंकड़ा केवल 24 लाख 38 हजार था। राज्य सरकार ने इन तीनों योजनाओं में दो करोड़ 92 लाख 60 हजार लोगों को कवर रखने का लक्ष्य रखा था। सरकार ने कहा था कि योजना की लांचिंग से तीन महीने के भीतर इस लक्ष्य को हासिल किया जाएगा। करीब दो महीने में लक्ष्य 50 प्रतिशत भी लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पाई। शेष लोगों को योजनाओं में कवर करने के लिए सरकार के लिए पास जुलाई का महीना बचा है। 
मंत्रियों की लगी थी ड्यूटी
बीमा और पेंशन योजनाओं में अधिक से अधिक लोगों को कवर करने के लिए राज्य सरकार ने बैंकों को सहयोग देने के लिए शिविर आयोजित करने के निर्देश कलेक्टरों को दिए थे। इसी तरह राज्य सरकार के मंत्रियों की ड्यूटी भी इन योजनाओं के लिए लगाई थी लेकिन इन प्रयासों के बाद भी 50 प्रतिशत लक्ष्य तक भी पूरा नहीं हुआ। 
इसलिए धीमी है रफ्तार
- योजनाओं के फार्म पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है।
- बीमा और बीसी एजेंटों को किसी प्रकार के कमीशन की सुविधा नहीं इसलिए वे दिलचस्पी नहीं ले रहे।
अब ये होगा
- जिला मुख्यालयों तक बड़ी संख्या में फार्म पहुंचाए जाएंगे। बैंक मैनेजरों की जिम्मेदारी होगी।
- समाचार पत्रों में भरकर फार्म बांटे जाएंगे।
- बीमा कंपनियों का सहयोग भी लिया जाएगा। 
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आधार लिंकेज में भी पिछड़े
प्रदेश में करीब 71 प्रतिशत लोगों के आधार नंबर हैं लेकिन इनमें से केवल 53 प्रतिशत लोगों ने अपने आधार नंबर को अपने बैंक खातों से लिंक कराया है। उल्लेखनीय है कि केंद्र-राज्य सरकार की कई योजनाओं के लाभ के लिए बैंकों खातों से आधार नंबर को लिंक कराना अनिवार्य किया गया है। बैंक कमेटी की बैठक में इसके लिए भी भी बैंक अधिकारी जागरूकता की कमी बताई। 
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इस मामले पर सरकार का पक्ष जानने के लिए राज्य के वित्त मंत्री जयंत मलैया एवं राज्य सरकार के प्रवक्ता मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा से संपर्क किया गया लेकिन दोनों मंत्रियों का फोन लगातार बंद रहा। 
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इन बहुप्रचारित योजनाओं में लोगों का रूझान नहीं होना बताता है कि वे उन 15 लाख रुपयों का इंतजार कर रहे हैं जो काला धन वापस आने से लोगों के हिस्से में आने वाले थे। शायद इसीलिए 60 प्रतिशत लोगों ने जन-धन योजना के खातों में कोई लेन-देन नहीं किया।
- केके मिश्रा, मुख्य प्रवक्त, मप्र कांग्रेस कमेटी